WhatsApp, Telegram समेत मैसेजिंग ऐप्स को बड़ी राहत, सिम-बाइंडिंग के लिए बढ़ सकती है टाइमलाइन

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भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के लिए सिम-बाइंडिंग नियम लागू करने की समयसीमा बढ़ाने के संकेत दिए हैं। अब WhatsApp, Telegram, Signal, ShareChat और Arattai जैसे प्लेटफॉर्म्स को दिसंबर 2026 तक इस नियम का पालन करने का समय मिल सकता है। कंपनियों ने तकनीकी दिक्कतों के चलते अतिरिक्त समय की मांग की थी।

क्या है सिम-बाइंडिंग नियम?

नवंबर 2025 में जारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक, जिन ऐप्स में यूजर पहचान के लिए मोबाइल नंबर का उपयोग होता है, उन्हें उस नंबर को डिवाइस में मौजूद एक्टिव सिम से लिंक करना होगा। इसका उद्देश्य बिना सक्रिय सिम के ऐप के उपयोग को रोकना और फर्जी पहचान के जरिए होने वाले साइबर फ्रॉड पर लगाम लगाना है, खासकर विदेशों से संचालित मामलों में।

वेब वर्जन पर भी कड़ी निगरानी:-

DoT ने वेब वर्जन के लिए भी सख्त नियम प्रस्तावित किए हैं। इसके तहत हर 6 घंटे में ऑटो-लॉगआउट और दोबारा लॉगिन के लिए QR कोड आधारित री-ऑथेंटिकेशन अनिवार्य किया जा सकता है, ताकि यूजर सुरक्षा को और मजबूत किया जा सके।

क्यों बढ़ानी पड़ी समयसीमा?

सरकारी सूत्रों के अनुसार, कंपनियों को इस फीचर को लागू करने में कई तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर Apple के iOS प्लेटफॉर्म पर सिस्टम लेवल बदलाव जटिल बताए गए हैं। वहीं एंड्रॉयड पर इसे लागू करना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। मल्टी-डिवाइस सपोर्ट और ऐप आर्किटेक्चर में बदलाव भी बड़ी बाधा बने हुए हैं।

पहले क्या थी डेडलाइन?

शुरुआत में इस नियम को लागू करने की अंतिम तारीख फरवरी 2026 तय की गई थी, जिसमें 90 दिनों के भीतर अनुपालन और 120 दिनों में रिपोर्ट जमा करनी थी। बाद में इसे बढ़ाकर मार्च 2026 तक करने का अनुमान लगाया गया, लेकिन कंपनियां तय समयसीमा में इसे पूरा नहीं कर सकीं। अब नई संभावित डेडलाइन दिसंबर 2026 हो सकती है।

कंपनियों का क्या कहना है?

Meta के सूत्रों के मुताबिक, एंड्रॉयड पर सिम-बाइंडिंग फीचर फिलहाल बीटा टेस्टिंग में है और सरकार के साथ मिलकर समाधान विकसित किया जा रहा है। वहीं Zoho के अरट्टई प्लेटफॉर्म ने भी यूजर एक्सपीरियंस को प्रभावित किए बिना बदलाव लागू करने की बात कही है।

इंडस्ट्री में क्यों है असहमति?

कई कंपनियों का मानना है कि यह नियम मल्टी-डिवाइस लॉगिन और वेब एक्सेस पर असर डाल सकता है। इसके लिए ऐप की संरचना में बड़े बदलाव करने होंगे, जो तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर फ्रॉड पर रोक लगाने के लिए यह कदम जरूरी है, लेकिन इसे लागू करने के लिए संतुलित और व्यावहारिक रणनीति अपनाना भी उतना ही जरूरी होगा।