महिला आरक्षण और महा-परिसीमन से बदलेगा सियासी गणित: राजस्थान में 13 लोकसभा सीटें बढ़ने की संभावना

जयपुर। देश की संसद में हाल ही में हुई अहम हलचल का असर अब राज्यों की राजनीति पर दिखने लगा है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने लोकसभा में तीन प्रमुख विधेयक—संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्रशासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक—पेश किए हैं। इनका उद्देश्य महिला आरक्षण कानून को लागू करना है, लेकिन इसके साथ ही ‘महा-परिसीमन’ का जो फॉर्मूला सामने आया है, उसने राजस्थान से लेकर दिल्ली तक के दिग्गजों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
राजस्थान में लोकसभा सीटों में बड़ा इजाफा संभव:-
वर्तमान में लोकसभा की कुल 543 सीटें हैं, जो नए परिसीमन के बाद बढ़कर लगभग 850 तक पहुंच सकती हैं। इसका सीधा असर राजस्थान पर भी पड़ेगा।
- अभी राजस्थान में 25 लोकसभा सीटें हैं।
- परिसीमन के बाद इनमें करीब 13 सीटों की बढ़ोतरी की संभावना है।
- ऐसे में कुल सीटें बढ़कर 38 तक पहुंच सकती हैं।
- अन्य राज्यों में भी बदलाव की तस्वीर सामने आ रही है, जहां उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 और बिहार की 40 से बढ़कर 60 तक होने का अनुमान जताया जा रहा है।
विधानसभा में भी बढ़ सकती हैं सीटें:-
राजस्थान विधानसभा की मौजूदा 200 सीटों में भी इजाफे की तैयारी है। महिला आरक्षण लागू होने के बाद परिसीमन के जरिए इन्हें 260 से 300 तक ले जाने की चर्चा है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के संकेतों के अनुसार, सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी संभव है। यदि संख्या 300 तक पहुंचती है, तो महिला विधायकों की संख्या लगभग 100 हो सकती है, जो फिलहाल करीब 21 है।
विपक्ष का विरोध और सवाल:-
विधेयकों के पेश होते ही विपक्ष ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। कांग्रेस और अन्य दलों का आरोप है कि परिसीमन से उत्तर भारत को अधिक फायदा होगा, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सरकार पर पर्दे के पीछे फैसले लेने का आरोप लगाया और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
नेताओं में बढ़ी बेचैनी:-
महिला आरक्षण और परिसीमन के संभावित असर से कई मौजूदा नेताओं की चिंता बढ़ गई है। खासकर उन सीटों पर, जो लंबे समय से एक ही नेता या दल के कब्जे में रही हैं। रोटेशन के चलते सीटों के आरक्षित होने की आशंका ने सियासी समीकरण बदलने शुरू कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये विधेयक पारित होते हैं, तो 2029 का लोकसभा चुनाव राजस्थान की राजनीति की दिशा और दशा दोनों को बदल सकता है। नए चेहरों के लिए अवसर बढ़ेंगे, वहीं पुराने नेताओं के सामने अपनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी।