MLA Ravindra Singh Bhati: ओरण बचाने के लिए सड़क पर सोए, बुजुर्ग को कंधे पर बिठाकर चले , बोले ये लड़ाई…

MLA Ravindra Singh Bhati: ओरण बचाने के लिए सड़क पर सोए, बुजुर्ग को कंधे पर बिठाकर चले , बोले ये लड़ाई…
MLA Ravindra Singh Bhati: राजस्थान की रेगिस्तानी धरती पर इन दिनों ‘ओरण बचाओ पदयात्रा’ चर्चा का केंद्र बनी हुई है। जैसलमेर स्थित तनोट माता मंदिर से शुरू हुई यह यात्रा अब जोधपुर जिले के बालेसर क्षेत्र तक पहुँच चुकी है। गुरुवार रात बाड़मेर जिले की शिव विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी पदयात्रा में शामिल हुए और आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाया।
जब विधायक ने कंधे पर उठाया पर्यावरण का ‘मान’
बालेसर में एक भावुक दृश्य देखने को मिला, जब विधायक भाटी ने पर्यावरण कार्यकर्ता सुमेर सिंह को अपने कंधों पर बैठाकर लगभग एक किलोमीटर तक पैदल यात्रा की। इसे युवाओं द्वारा अपनी परंपरा और विरासत को सम्मान देने का प्रतीक बताया गया। भाटी ने रात पदयात्रियों के साथ चामुंडा माता मंदिर परिसर में ही विश्राम किया।
“मैं किसी दल का नहीं, सच का पक्षधर हूँ”
पदयात्रियों को संबोधित करते हुए भाटी ने कहा कि वे किसी दल विशेष से ऊपर उठकर जनता और सच के पक्ष में खड़े हैं। उन्होंने कहा कि ओरण, गोचर और आगौर भूमि की रक्षा केवल जमीन का मुद्दा नहीं, बल्कि संस्कृति, पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा प्रश्न है। 30 से अधिक दिनों से जारी इस पदयात्रा को उन्होंने जन-जागरण का बड़ा अभियान बताया।
क्या है ‘ओरण’?
राजस्थान के ग्रामीण समाज में ‘ओरण’ पारंपरिक रूप से संरक्षित वनभूमि होती है। इन क्षेत्रों में:
- पशुओं के लिए चारागाह सुरक्षित रहता है।
- वर्षाजल संरक्षण के प्राकृतिक स्रोत (आगौर) बने रहते हैं।
- धार्मिक मान्यता के कारण पेड़ों की कटाई पर सामाजिक रोक होती है।
- आंदोलनकारियों का आरोप है कि औद्योगिक और विकास परियोजनाओं के विस्तार से इन पारंपरिक संरक्षित क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है।
जयपुर तक जाएगी पदयात्रा:-
सुमेर सिंह और भोपाल सिंह के नेतृत्व में निकली यह लगभग 725 किलोमीटर लंबी यात्रा जयपुर तक पहुँचने का लक्ष्य रखती है, ताकि राज्य सरकार तक ओरण संरक्षण की मांग मजबूती से रखी जा सके। इस पदयात्रा में बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में शामिल हैं। बताया जा रहा है कि कुछ प्रतिभागी अब तक 300 किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर चुके हैं।
रविंद्र सिंह भाटी की भागीदारी ने इस जन-आंदोलन को नई चर्चा और ऊर्जा दी है, और इसे ग्रामीण पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।