बाड़मेर के गिरल धरने पर बैठे मजदूर की तबीयत बिगड़ने से मौत, ग्रामीणों में आक्रोश; रविंद्र सिंह भाटी का फूटा गुस्सा

बाड़मेर। गिरल माइंस के बाहर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर लंबे समय से चल रहे धरने के बीच एक श्रमिक की मौत से मामला और गंभीर हो गया है। धरने पर बैठे श्रमिक जैसाराम मेघवाल की तबीयत अचानक बिगड़ने पर उन्हें बाड़मेर जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया।
घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय ग्रामीणों और आंदोलनकारी श्रमिकों में रोष फैल गया। वहीं, शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी भी समर्थकों के साथ जिला अस्पताल पहुंचे और मृतक के परिजनों से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की। उन्होंने इस घटना के लिए प्रशासन और माइंस प्रबंधन के अड़ियल व उदासीन रवैये को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया।।
श्रमिक जैसाराम मेघवाल के असामयिक निधन से आहत और आक्रोशित विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने बाड़मेर जिला अस्पताल की मोर्चरी से ही पूरे घटनाक्रम को लेकर राज्य सरकार, जिला प्रशासन और गिरल माइंस प्रबंधन पर तीखा हमला बोला। भाटी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स पर विस्तृत प्रतिक्रिया साझा करते हुए नौकरशाही की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठाए।
विधायक भाटी ने लिखा, “प्रशासन के तानाशाही और संवेदनहीन रवैये के कारण एक गरीब और बेकसूर मजदूर इस सरकारी व्यवस्था की भेंट चढ़ गया।”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा, आश्रित को सरकारी नौकरी और माइंस में स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर ठोस लिखित समझौता नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
‘प्रशासन सोता रहा गहरी नींद’
भाटी ने स्वर्गीय जैसाराम मेघवाल और उनके परिवार के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थानीय लोगों ने अपनी पुश्तैनी और उपजाऊ जमीनें सरकार को सौंपीं, लेकिन बदले में उन्हें उपेक्षा और मानसिक प्रताड़ना मिली।
उन्होंने लिखा, “स्वर्गीय जैसाराम मेघवाल उन लोगों में थे जिन्होंने औद्योगिक विकास के लिए अपनी कीमती जमीनें सहर्ष सरकार को दी थीं। विडंबना यह है कि अपनी जायज मांगों को लेकर वे पिछले दो माह से भीषण गर्मी और धूलभरे माहौल में गिरल माइंस कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे थे, लेकिन प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी तब भी गहरी नींद में थे। आज एक मजदूर की जान जाने के बाद भी उनकी संवेदनशीलता दिखाई नहीं दे रही है।”
‘और कितने गरीब मजदूरों की जानें लेना बाकी?’
लगातार 60 दिनों से जारी आंदोलन के बीच हुई इस मौत को लेकर भाटी ने सरकार और प्रशासन से कई सीधे सवाल पूछे। उन्होंने कहा, “आखिर इस बहरे और गूंगे सिस्टम को जगाने के लिए और कितने गरीब मजदूरों की जानें लेना बाकी रह गई है? क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक गरीब को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने और अपने हक की मांग करने का अधिकार भी नहीं है?”