एथेनॉल से चीनी महंगी होने का अशोक गहलोत का दावा कितना सही? जानिए क्या कहते हैं आंकड़े

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जयपुर। Rkhabar

पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। गहलोत ने आरोप लगाया है कि गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी के बजाय एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किए जाने से बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई और कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई। उन्होंने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के माइलेज और इंजन पर असर पड़ने का दावा भी किया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए एथेनॉल नीति को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? उपलब्ध सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञ अध्ययनों की पड़ताल करने पर तस्वीर कुछ अधिक जटिल नजर आती है।

गन्ने से एथेनॉल की ओर हुआ डायवर्जन, लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं

भारत की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के तहत चीनी उद्योग से जुड़े गन्ने और उससे बनने वाले उत्पादों का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया गया है। इसका उद्देश्य पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाना और किसानों के लिए गन्ने के बेहतर उपयोग का रास्ता तैयार करना है।

हालांकि, मौजूदा चीनी सीजन में एथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई मात्रा को लेकर सरकार का कहना है कि यह पिछले वर्षों की तुलना में कम रही है। सरकार ने हाल में चीनी की कीमतों में तेजी के लिए एथेनॉल डायवर्जन को मुख्य कारण मानने से इनकार किया है।

सरकारी आकलन के अनुसार इस सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान शुरुआती 343 लाख टन से घटकर करीब 306 लाख टन रह गया है। यानी उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आई है। ऐसे में घरेलू बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है।

चीनी के दाम बढ़ने के पीछे कई कारण

चीनी की कीमतों में हालिया तेजी को केवल एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं बताता। सरकारी पक्ष के अनुसार कम उत्पादन के अलावा मौसम से फसल को नुकसान, घरेलू मांग में बदलाव, वैश्विक बाजार में आपूर्ति की स्थिति, बाजार में जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसे कई कारण भी कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए गहलोत का यह कहना कि एथेनॉल और चीनी बाजार का कोई संबंध नहीं है, सही नहीं होगा। गन्ने के उपयोग का एक हिस्सा एथेनॉल की ओर जाने से चीनी उत्पादन और उपलब्धता पर असर पड़ने की संभावना रहती है। लेकिन मौजूदा कीमत बढ़ोतरी की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति पर डालना उपलब्ध आंकड़ों से साबित नहीं होता।

E20 से माइलेज घटने का दावा कितना सही?

गहलोत ने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के कारण वाहनों का माइलेज कम होने और इंजन खराब होने का भी दावा किया है। यहां तस्वीर दो हिस्सों में समझना जरूरी है।

NITI Aayog की एथेनॉल ब्लेंडिंग पर तैयार रिपोर्ट के अनुसार E20 ईंधन का इस्तेमाल उन पुराने चार पहिया वाहनों में ईंधन दक्षता को लगभग 6-7 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकता है, जो E0 के लिए डिजाइन और E10 के लिए कैलिब्रेट किए गए थे। पुराने दोपहिया वाहनों में यह प्रभाव करीब 3-4 प्रतिशत तक आंका गया था। वहीं E10 के लिए डिजाइन किए गए और E20 के लिए कैलिब्रेटेड चार पहिया वाहनों में प्रभाव करीब 1-2 प्रतिशत बताया गया है।

इसका मतलब यह है कि माइलेज में कमी की चिंता पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है, खासकर पुराने या उच्च एथेनॉल मिश्रण के लिए अनुकूलित नहीं किए गए वाहनों के मामले में।

लेकिन क्या E20 से इंजन खराब होना साबित हो चुका है?

यह दावा अधिक सावधानी से देखने की जरूरत है।

NITI Aayog की रिपोर्ट में ARAI, Indian Institute of Petroleum और Indian Oil Corporation द्वारा किए गए परीक्षणों का उल्लेख है। इन परीक्षणों में E20 के साथ वाहन संचालन के दौरान गंभीर खराबी या इंजन के रुकने जैसी समस्या नहीं पाई गई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परीक्षण के दौरान इंजन के हिस्सों में असामान्य घिसावट या इंजन ऑयल के खराब होने जैसी गंभीर समस्या सामने नहीं आई।

इसलिए “E20 से सभी वाहनों के इंजन खराब हो रहे हैं” कहना उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर बहुत व्यापक दावा होगा।

हां, पुराने वाहनों और अधिक एथेनॉल मिश्रण के लिए डिजाइन नहीं किए गए इंजन में सामग्री की अनुकूलता, कैलिब्रेशन और ईंधन दक्षता से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। यही कारण है कि NITI Aayog की रोडमैप रिपोर्ट में पुराने वाहनों के लिए E10 जैसे कम-ब्लेंड ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने की जरूरत पर भी जोर दिया गया था।

एथेनॉल ब्लेंडिंग का सरकार को क्या फायदा?

एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति केवल पेट्रोल में दूसरा ईंधन मिलाने की योजना नहीं है। इसके पीछे कच्चे तेल के आयात को कम करना, विदेशी मुद्रा की बचत, गन्ना किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार और कृषि उत्पादों से ईंधन उत्पादन जैसे उद्देश्य भी हैं।

NITI Aayog की रोडमैप रिपोर्ट में E20 कार्यक्रम से पेट्रोलियम आयात में कमी और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े संभावित लाभों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में यह भी माना गया है कि उच्च एथेनॉल मिश्रण के लिए वाहनों के इंजन और ईंधन प्रणाली को उसके अनुरूप तैयार करना जरूरी है।

तो क्या अशोक गहलोत का दावा सही है?

फैक्ट चेक का निष्कर्ष: गहलोत के दावे में कुछ तथ्य हैं, लेकिन इसे पूरी तरह सही कहना उचित नहीं होगा।

  • गन्ने और चीनी उद्योग से एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्जन हुआ है — यह तथ्य है।
  • एथेनॉल के लिए गन्ने/चीनी का डायवर्जन चीनी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है — इसका बाजार से संबंध है।
  • हालांकि मौजूदा चीनी महंगाई की पूरी वजह एथेनॉल नीति है — यह दावा उपलब्ध सरकारी आंकड़ों से साबित नहीं होता।
  • E20 से कुछ पुराने वाहनों में माइलेज कम हो सकता है — NITI Aayog की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि/अनुमान दिया गया है।
  • E20 के कारण बड़े पैमाने पर इंजन खराब हो रहे हैं — उपलब्ध आधिकारिक परीक्षणों से ऐसा व्यापक निष्कर्ष नहीं निकलता।
  • वाहनों को उच्च एथेनॉल मिश्रण के अनुरूप डिजाइन और कैलिब्रेट करना जरूरी है — यह तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण बिंदु है।

निष्कर्ष

अशोक गहलोत ने जिस तरह एथेनॉल ब्लेंडिंग, चीनी की कीमत और पुराने वाहनों के माइलेज को एक साथ जोड़कर सरकार पर निशाना साधा है, उसमें कुछ वास्तविक आर्थिक और तकनीकी चिंताएं जरूर मौजूद हैं, लेकिन चीनी की मौजूदा महंगाई का एकमात्र कारण एथेनॉल नीति बताना सही नहीं होगा।

चीनी उत्पादन में इस साल आई कमी, मौसम का असर, मांग-आपूर्ति का संतुलन और बाजार की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। दूसरी ओर, E20 को लेकर पुराने वाहनों की ईंधन दक्षता और अनुकूलता की चिंता भी पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती।

यानी गहलोत का दावा पूरी तरह गलत नहीं, लेकिन “आधा सच” जरूर है—एथेनॉल नीति का असर है, पर चीनी महंगाई और वाहन संबंधी समस्याओं की पूरी कहानी सिर्फ एथेनॉल नहीं है।

Rkhabar.com फैक्ट चेक: उपलब्ध सरकारी आंकड़ों और NITI Aayog की रिपोर्ट के आधार पर गहलोत के दावे को “आंशिक रूप से सही” माना जा सकता है।

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