Save Aravalli: 10,000 सक्रिय खानों से रोज छलनी हो रही अरावली, संरक्षण नहीं राजस्व को प्राथमिकता दे रहीं सरकारें
Save Aravalli: 10,000 सक्रिय खानों से रोज छलनी हो रही अरावली, संरक्षण नहीं राजस्व को प्राथमिकता दे रहीं सरकारें
Save Aravalli : राजस्थान में करीब 50 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली अरावली पर्वतमाला आज बड़े पैमाने पर खनन की मार झेल रही है। अनुमान है कि अरावली क्षेत्र में करीब 10 हजार सक्रिय खानें संचालित हो रही हैं, जिससे यह प्राचीन पर्वतमाला लगातार छलनी होती जा रही है।
अरावली में खनन को लेकर मामला करीब 30 वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस दौरान कई बार न्यायालय ने हस्तक्षेप किया, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर खनन गतिविधियां पूरी तरह थम नहीं सकीं। राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और गुजरात में फैली अरावली को लेकर सियासत तो खूब हुई, लेकिन संरक्षण के ठोस प्रयास नजर नहीं आए।
राजस्थान में अरावली का कुल क्षेत्रफल करीब 1.13 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 50 हजार वर्ग किलोमीटर पहाड़ी क्षेत्र शामिल है। इसके बावजूद सरकारों ने संरक्षण की बजाय अक्सर राजस्व को प्राथमिकता दी।
20 जिलों में फैला अरावली क्षेत्र:-
विभागीय सूत्रों के अनुसार प्रदेश के 20 जिलों में अरावली पहाड़ियों का विस्तार 50 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक है। इनमें से 8 से 10 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है, जहां पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर या उससे अधिक है। अरावली के वास्तविक क्षेत्रफल और स्थिति का स्पष्ट आकलन केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा एमपीएसएम (MPSM) तैयार होने के बाद ही सामने आएगा।
सुप्रीम कोर्ट में अरावली से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम:-
- 1995 : अरावली हिल्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर।
- 30 अक्टूबर 2002 : हरियाणा के आलमपुर और कोटे गांव में अवैध खनन पर पहली बार रोक।
- 9 दिसंबर 2002 : राजस्थान में अरावली क्षेत्र की सभी खानों को बंद करने के आदेश।
- 16 दिसंबर 2002 : राज्य सरकार की याचिका पर संशोधित आदेश, वैध खानों को चालू रखने और अवैध खनन पर सख्ती के निर्देश।
- 8 अप्रैल 2005 : राजस्थान सरकार का शपथ-पत्र, 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों को अरावली मानते हुए वहां नए खान आवंटन पर रोक।
- 20 नवंबर 2025 : अरावली हिल्स मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला।
रोक नहीं लगती तो हालात और भयावह होते
अरावली से जुड़े मामले के लंबे समय तक न्यायालय में लंबित रहने के कारण पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से नई खानों के आवंटन पर रोक रही है। वर्तमान में जो खानें संचालित हैं, वे दशकों पहले आवंटित की गई थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते यह रोक नहीं लगाई जाती, तो अरावली का बड़ा हिस्सा अब तक पूरी तरह नष्ट हो चुका होता।
अरावली की खानों का गणित (अनुमानित)
- 11 हजार से अधिक खानें 20 जिलों में आवंटित
- 10 हजार खानें 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में
- 1,008 खानें 100 मीटर से अधिक ऊंचाई पर
- 747 खानें (100 मीटर से अधिक ऊंचाई पर) वर्तमान में संचालित
- 261 खानें नवीनीकरण प्रक्रिया में
- करीब 9,500 खानें 100 मीटर से नीचे के क्षेत्रों में संचालित
- करीब 900 वर्ग किमी क्षेत्र में लगभग 10 हजार खानें सक्रिय
(सभी आंकड़े अनुमानित हैं)
3 हजार नई खानें अभी भी इंतजार में:-
खान विभाग के अनुसार बीते कुछ वर्षों में अरावली क्षेत्र में 3 हजार से अधिक नई खानें आवंटित की जा चुकी हैं, लेकिन न्यायालय की रोक के चलते इनका संचालन नहीं हो सका।
हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इनके संचालन का रास्ता खुला है, हालांकि इन खानों को भी केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा एमपीएसएम तैयार होने के बाद ही शुरू किया जाएगा।