बीकानेर में 2 हजार करोड़ रुपए की ऊन मंडी पर संकट, ईरान में अस्थिरता से चार महीने से व्यापार ठप

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बीकानेर में 2 हजार करोड़ रुपए की ऊन मंडी पर संकट, ईरान में अस्थिरता से चार महीने से व्यापार ठप

Bikaner News: बीकानेर, एशिया की कभी सबसे बड़ी ऊन मंडी रहा बीकानेर आज गहरे संकट से जूझ रहा है। वैश्विक ट्रेड वॉर और ईरान में जारी राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर ऊन उद्योग पर पड़ रहा है। पिछले करीब चार महीनों से ईरान से ऊन का आयात पूरी तरह बंद है, जिससे यहां का पूरा उद्योग प्रभावित हुआ है। बीकानेर में मुख्य रूप से कालीन धागा यानी कार्पेट यार्न का उत्पादन होता है। वर्तमान में करीब 2000 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर वाले इस उद्योग में 300 से 350 यूनिट सक्रिय हैं, लेकिन स्थानीय उत्पादन घटने के कारण अब यह पूरी तरह आयातित ऊन पर निर्भर हो गया है। ऐसे में वूलन इंडस्ट्री को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है, जबकि व्यापारी नए बाजार तलाशने में जुटे हैं।

18वीं सदी से निर्यात का मजबूत इतिहास:-

बीकानेर का ऊन कारोबार एक समृद्ध और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा रहा है। यह क्षेत्र कभी एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी के रूप में पहचाना जाता था। 18वीं शताब्दी से ही यहां से ऊन और कंबल का निर्यात होता रहा है, जिसका व्यापार काबुल और मुल्तान तक फैला था। उच्च गुणवत्ता की देशी ऊन, ऊनी धागा और कालीन निर्माण के लिए बीकानेर की अलग पहचान रही है। वर्ष 1950 के दशक में यहां पहली बार धागा निर्माण की फैक्ट्री की स्थापना हुई थी।

ईरान पर काफी निर्भर है बाजार:-

उद्योग से जुड़े संजय राठी बताते हैं कि पहले रोजाना लगभग तीन लाख किलो ऊन ईरान से बीकानेर आती थी। यहां ऊन की प्रोसेसिंग और सफाई के बाद उसे दोबारा ईरान भेजा जाता था, जहां विश्व प्रसिद्ध पर्शियन कार्पेट तैयार किए जाते हैं। हर महीने औसतन 25 कंटेनर ऊन ईरान से बीकानेर पहुंचते थे, लेकिन मौजूदा हालात में न माल आ रहा है और न ही वहां से संपर्क संभव हो पा रहा है। उन्होंने बताया कि पहले ईरान में टैक्स और टैरिफ की दिक्कतें थीं, लेकिन अब नेटवर्क बंद होने और अस्थिरता के कारण व्यापार पूरी तरह ठप हो गया है।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनी चुनौती:-

उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि आने वाले दो से तीन महीनों तक हालात सामान्य होने की उम्मीद बेहद कम है। कच्चे माल की कमी के चलते अब उद्योग को दूसरे देशों से ऊन मंगाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हालांकि यूरोपीय देशों से ऊन आयात करने पर लागत 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक बढ़ जाती है, जिससे उत्पादन महंगा हो रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करना कठिन होता जा रहा है।

बजट से उद्योग को राहत की उम्मीद:-

व्यापारी नरेंद्र सुराणा का कहना है कि इटली, सीरिया, सऊदी अरब, बेल्जियम और आयरलैंड जैसे देशों से संपर्क किया जा रहा है, ताकि उद्योग को किसी तरह बचाया जा सके। वहीं क्षेत्र में भेड़ पालन लगातार घट रहा है, क्योंकि नई पीढ़ी इस व्यवसाय की ओर आकर्षित नहीं हो रही है। इससे स्थानीय स्तर पर ऊन की उपलब्धता भी कम होती जा रही है। व्यापारियों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि आगामी बजट में बीकानेर के आसपास भेड़ फार्म विकसित करने की योजना लाई जाए और भेड़पालकों को सब्सिडी देकर इस पारंपरिक उद्योग को संजीवनी दी जाए।