Rajasthan: प्रमोद शर्मा मामले पर गरमाई सियासत, सांसद हनुमान बेनीवाल ने CM भजनलाल से पूछे ये 10 सवाल

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जयपुर। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के सांसद हनुमान बेनीवाल ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और राजस्थान पुलिस प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है। बेनीवाल ने एक विवादित आपराधिक मामले का संदर्भ लेते हुए सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से जवाब मांगा है। मामला प्रमोद शर्मा नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिस पर जमीन संबंधी धोखाधड़ी के गंभीर मुकदमे दर्ज बताए जा रहे हैं और जो राजनीतिक गलियारों में खुद को मुख्यमंत्री का करीबी या रिश्तेदार बताता है।

सांसद हनुमान बेनीवाल ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने 10 तीखे सवालों के जरिए आरोप लगाया कि प्रदेश में प्रभावशाली लोगों और आम नागरिकों के लिए कानून के अलग-अलग मापदंड दिखाई दे रहे हैं।

पहला सवाल:

बेनीवाल ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब किसी आम नागरिक या गरीब व्यक्ति पर मामूली मुकदमा दर्ज होता है तो पुलिस तत्काल सक्रिय होकर कार्रवाई शुरू कर देती है। लेकिन जब मामला प्रमोद शर्मा जैसे व्यक्ति से जुड़ता है, जो खुद को मुख्यमंत्री का रिश्तेदार बताता है, तब कानून की रफ्तार धीमी क्यों पड़ जाती है?

दूसरा सवाल:

उन्होंने पूछा कि जमीन हड़पने, फर्जी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने तथा धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोपों वाले मामले में जब उच्च न्यायालय भी आरोपी को राहत देने से इनकार कर चुका है, तो प्रशासन जनता को यह बताए कि उसकी गिरफ्तारी आखिर कब तक सुनिश्चित की जाएगी?

तीसरा सवाल:

आरएलपी सांसद ने कहा कि यदि प्रमोद शर्मा वास्तव में पुलिस की पहुंच से बाहर है और पुलिस की टीमें उसे तलाशने में सफल नहीं हो पा रही हैं, तो क्या सरकार और पुलिस मुख्यालय उसकी गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित करने का कदम उठाएंगे?

चौथा सवाल:

बेनीवाल ने पूछा कि यदि गिरफ्तारी नहीं हो पा रही है तो इनाम घोषित करने में देरी क्यों हो रही है? उन्होंने कहा कि प्रदेश का युवा, किसान और आम नागरिक जानना चाहता है कि एक गंभीर मामले के आरोपी के प्रति सरकारी मशीनरी और स्थानीय प्रशासन का रवैया इतना नरम क्यों दिखाई दे रहा है।

पांचवां सवाल:

उन्होंने भाजपा सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार बार-बार दावा करती है कि कानून सबके लिए बराबर है। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि यह सिद्धांत केवल आम लोगों और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं पर लागू होता है या फिर सत्ता से जुड़े लोगों पर भी समान रूप से लागू किया जाता है।

छठा सवाल:

अपने अगले सवाल में बेनीवाल ने पूछा कि क्या वर्तमान व्यवस्था में रिश्तेदारी और व्यक्तिगत संबंध कानून तथा न्याय व्यवस्था से भी ऊपर हो गए हैं? उन्होंने कहा कि जनता सरकार की कथनी और करनी के बीच का अंतर साफ देख रही है।

सातवां सवाल:

सांसद ने प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या जांच अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन को उच्च स्तर से मौखिक निर्देश दिए गए हैं कि कुछ प्रभावशाली लोगों को कानूनी कार्रवाई से बचाया जाए? यदि ऐसा नहीं है, तो अदालत के आदेशों के बावजूद कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है?

आठवां सवाल:

उन्होंने पूछा कि यदि प्रमोद शर्मा की जगह कोई सामान्य नागरिक, किसान, दलित या पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति होता, तो क्या अब तक उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हो चुकी होती? क्या उसे जेल नहीं भेज दिया गया होता?

नौवां सवाल:

बेनीवाल ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं का उदाहरण देते हुए कहा कि जब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को ज्ञापन देने गए आरएलपी कार्यकर्ताओं पर तुरंत मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं और उनकी गिरफ्तारी के लिए इनाम तक घोषित कर दिया जाता है, तो फिर प्रमोद शर्मा जैसे आरोपी के मामले में ऐसी सक्रियता क्यों दिखाई नहीं देती?

दसवां सवाल:

अपने अंतिम सवाल में सांसद ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा कि क्या प्रमोद शर्मा और उसके जैसे अन्य प्रभावशाली लोगों को कानून और पुलिस कार्रवाई से बचाने के लिए कोई विशेष संरक्षण प्राप्त है? या फिर जनता यह मान ले कि सरकार रिश्तेदारी निभाने में अधिक व्यस्त है और प्रदेश में कानून का राज केवल भाषणों और विज्ञापनों तक सीमित रह गया है?