ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच रूस कमा रहा करोड़ों रुपये, हर दिन 1250 करोड़ का अतिरिक्त मुनाफा

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Iran-Israel War: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक एनर्जी मार्केट की सप्लाई चेन को झकझोर दिया है। कई देशों में तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की वजह से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, जिससे कच्चे तेल की सप्लाई पर दबाव बना है। इस स्थिति के बीच रूस को बड़ा आर्थिक फायदा मिल रहा है। अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण रूस को रोज करीब 150 मिलियन डॉलर (करीब 1250 करोड़ रुपये) की अतिरिक्त आय हो रही है।

मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बाद वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति कम हुई है, जिसके चलते कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। इसी कारण भारत और चीन जैसे बड़े आयातक देशों ने रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है।

रूस की आय में तेजी:-

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के आंकड़ों के अनुसार, रूस की जीवाश्म ईंधन से होने वाली कुल आय बढ़कर लगभग 510 मिलियन यूरो (550 मिलियन डॉलर से ज्यादा) प्रतिदिन हो गई है। यह फरवरी के औसत से करीब 14 प्रतिशत अधिक है। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेजी और सप्लाई में कमी इसके मुख्य कारण माने जा रहे हैं।

हॉर्मुज स्ट्रेट से तेल आपूर्ति प्रभावित होने से वैश्विक बाजार में प्रतिदिन करीब 1 करोड़ बैरल तेल की कमी का अनुमान लगाया जा रहा है। इसका सीधा असर ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर पड़ा है, जो 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई है।

कीमत बढ़ने से अतिरिक्त मुनाफा:-

तेल की कीमतों में तेजी के कारण रूस को हर दिन करीब 45 मिलियन यूरो (लगभग 49 मिलियन डॉलर) की अतिरिक्त कमाई हो रही है। संघर्ष शुरू होने के शुरुआती दो हफ्तों में रूस को कुल मिलाकर करीब 6 अरब यूरो (लगभग 6.5 से 6.9 अरब डॉलर) का अतिरिक्त फायदा हुआ है।

भारत और चीन ने बढ़ाई खरीद:–

मिडिल ईस्ट में अचानक आपूर्ति बाधित होने के बाद रिफाइनरियों को वैकल्पिक कच्चे तेल के स्रोत तलाशने पड़े। इसी कारण भारत और चीन ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी, ताकि घरेलू ऊर्जा जरूरतों को स्थिर रखा जा सके।

मार्केट इंटेलिजेंस फर्म Kpler के अनुसार, फरवरी के अंत से रूसी तेल से भरे टैंकरों के फ्लोटिंग स्टोरेज में 1.8 से 3.2 करोड़ बैरल तक की कमी आई है। इससे संकेत मिलता है कि पहले से स्टॉक में मौजूद तेल को भी तेजी से खरीदा जा रहा है। वहीं चीन की कुछ सरकारी ऊर्जा कंपनियों ने गर्मियों तक के लिए रियायती रूसी तेल खरीदने के समझौते भी किए हैं।

बजट लक्ष्य से ऊपर पहुंची कीमत:-

रूस के यूराल्स क्रूड की कीमत करीब 62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जो रूस के संघीय बजट में तय 59 डॉलर प्रति बैरल के लक्ष्य से ज्यादा है। तेल कीमतों में बढ़ोतरी के चलते रूस की सरकारी आय भी बढ़ी है और अनुमान है कि संघर्ष शुरू होने के बाद से उसे अरबों डॉलर का अतिरिक्त टैक्स राजस्व मिला है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर:-

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में बाधा लंबे समय तक बनी रहती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इससे महंगाई बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पर भी दबाव पड़ने की आशंका है। फिलहाल यह स्थिति रूस के लिए आर्थिक लाभ का अवसर बनती दिखाई दे रही है।